तन्हा लम्हों में चुनकर, एक आशियाना बनाने की कोशिश करता हूँ, हार जाता हूँ, हर दफा, जब भी मुस्कुराने की कोशिश करता हूँ!
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वो यादें।
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वो यादें, वो किरदार, मेरे अकेलेपन की पुकार, सब जानती हैं तू, तेरे इश्क़ के लिए मेरा इजहार। हाँ, तू जरूर कोई कोशिश होगी मेरे जुनून की, वरना कहाँ ये जमाना और कहाँ तेरा प्यार
तेरे हुस्न पे तारीफ भरी किताब लिख देता, काश की तेरी वफा तेरे हुस्न के बराबर होती। तेरे हुस्न का दीवाना कहाँ किसी की होगा। सोचता हूँ, हर कागज पे तेरी तारीफ करूँ, फिर लगता है, कहीं पढ़ने वाला तेरे दीवाना ना हो जाए।
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Drbhavnabharti11997@gmail.com